दूरियां

रोज़ सूरज की तरह उम्मीद की किरणे जाग उठती हैं पर शायद शाम तक उन्हें कहीं भूल ही आते हैं कोशिश रहती है सब सही करने की पर ये अपने हैं कि उसे गलत में तब्दील कर ही देते हैं फिर भी कोई शिकायत नहीं रखते इस बात पर कि कल हम इनका भरोसा जीत … Continue reading दूरियां

उड़ रहा धुआं

बनी है ये ऐसे पदार्थों से, फ़िर भी पी लेते हो तुम इसे । यूं तो मौत से डरते हो, फिर कैसे भला इसका स्वागत करते हो । हंस-हंस के अपनी मौत का, छपवाते हो न्यौता । उड़ाते हो धुआं , और खोदते हो अपनी मौत का कुआं । मना करने पर भी नहीं मानते … Continue reading उड़ रहा धुआं

देवियां

तुम उको कमजोर कहत हो  पर तुमौ भूलत रहे कि उ खुदै दुर्गा रही । तुम उको अलक्समी कहत हो पर तुमौ  भुलत रहे कि उ खुदै लक्समी रही । तुम उको अज्ञानी कहत हो पर तुमौ भूलत रहे कि उ खुदै सरस्वती रही । तुम उको किसी और के संग देखत अपबि‌‌‍‍त्र कहत हो … Continue reading देवियां