बनी है ये ऐसे पदार्थों से,
फ़िर भी पी लेते हो तुम इसे ।
यूं तो मौत से डरते हो,
फिर कैसे भला इसका स्वागत करते हो ।
हंस-हंस के अपनी मौत का,
छपवाते हो न्यौता ।
उड़ाते हो धुआं ,
और खोदते हो अपनी मौत का कुआं ।
मना करने पर भी नहीं मानते ,
आसपास के लोगों के बारे में एक पल भी ना सोचते ।
यूं तो अपने परिवार के लिए भिड़ जाते हो ,
पर अपने परिवार के लिए धुआं ना छोड़ पाते हो ।
हो जवान या हो बूढ़ा ,
लगती है जब इसकी लत यह किसी की ना है सुनता,
किसी करतब की भांति कभी ना क्या मुंह से उड़ाते हो तुम यह धुंआ।
एक पल में नहीं ,
पर धीरे-धीरे ही सही ।
यह धुआं कर रहा तुम्हें अंदर से खोखला ,
तुम्हारे परिवार और उज्जवल भविष्य का घोट रहा गला।