दूरियां

रोज़ सूरज की तरह

उम्मीद की किरणे जाग उठती हैं

पर शायद शाम तक

उन्हें कहीं भूल ही आते हैं

कोशिश रहती है सब सही करने की

पर ये अपने हैं कि उसे गलत में तब्दील कर ही देते हैं

फिर भी कोई शिकायत नहीं रखते

इस बात पर कि कल हम इनका भरोसा जीत ही लेंगे

रोज़ आंखे बंद करते है

इस उम्मीद में कि हमारा कल

आज से बेहतरीन होगा

और इसी के सहारे आज तक जिंदा ही रहे है

शायद हम में ही कुछ खामियां होगी

वरना क्यूं कुछ अपनों ने यूं पराया कर दिया

जिसे ज़ुबां से बयां करना 

अब सज़ा बन गया

अपनों ने तो यूं साथ छोड़ा

कि अब तो ये वीरान दीवारें ही हाल बता देती हैं

शाम घर लौटते

तो इन्हें ही निहार कर अपनों का एहसास पा लेते।

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